व्रूं व्रैं व्रौं हं
नक्षत्र विवरण वर्तमान प्रचलित Astrology और Astronomy के निर्धारित मापदण्डों से परे है! Reader has the full right not to believe it.
रक्तकाली अर्थात लक्ष्मी जिस उलूक पर बैठती हैं, उस उलूक का नाम अभिजीत है। शायद इसीलिए नक्षत्र सूची में इसका नाम स्थान और गणना छिपी है या छिपा दी गई है। यह उलूक सोने की बनी लंका का केंद्र है। इसे रावण कि नाभि ही समझिए, जब तक यह उल्लू नहीं मरेगा, तब तक 10 सिरों वाला रावण भी नहीं मरेगा। गेंहूं के साथ घुन के जैसे पिसता है यह अभिजीत। एक तरफ श्रवण रूपी रावण और दूसरी तरफ उत्तराषाढ़ रूपी विभीषण रूपी कर्म अथवा विश्वकर्मा। रावण और विभीषण के मध्य यह अभिजीत नामक उल्लू आज भी लक्ष्मी का वाहन। यह उलूक बहुत ही बुद्धिमान है और उन्हें ही दिखता है जो जिसका तृतीय नेत्र खुल चुका हो या खुलने वाला हो। स्वाति तथा विशाखा के दल-बदल सिद्धान्त वाले डामर इस उलूक से विशेष दूरी बनाए रखते हैं।
‘यत्पिंडे तत् ब्रम्हांडे’ का सिद्धान्त मनुष्य के शरीर पर भी लागू होता है। जगत का प्राण कहा जाने वाला प्राणबीज “ह” वैसे तो हृदय बीज है लेकिन इसका स्रोत अभिजीत नामक नाभिकूट में ही है जो कुंडलिनी जागरण में “मणिपुर चक्र” के नाम से विख्यात है। यह कूट बहुत ही विवादास्पद है। बहुत से धर्मों कि मान्यताएं इस से जुड़ी हैं। परंतु लेखक का उद्देश्य किसी की भी धार्मिक भावना को ठेस न पहुंचाते हुए सत्य को प्रकट भी करना है तो इस अभिजीत नामक उल्लू को भी निंदा नामक रुकावट को पार करके ही आगे बढ़ना होगा।
“श्रवण” रूपी रावण से ज्यादा बल है इस सहस्त्रबाहु “अभिजीत” के पास परंतु जब वो अपनी सीमाएं लांघता है तो “परशुराम” के द्वारा मारा जाता है। दीपावली के दिन इस अजर अमर उल्लू को पकड़ना और उसकी बलि देने की प्रथा, लक्ष्मी तंत्र के साथ साथ विभीषण द्वारा रक्षित इस “उलूक” के अतिरिक्त रावण के लिए भी डरावनी। यदि आधार ही नहीं रहा तो लंका टिकेगी किस पर? और लंका ही नहीं रही तो कौन सा रावण और कैसा विभीषण? लंका दहन में यह उलूक मण्डल भी वैसे ही जलता है जैसे रावण।
अभिजीत और श्रवण की डिग्री आज भी नासा के खगोल वैज्ञानिक पृथक नहीं कर पाए हैं और वर्तमान समय में उत्तराषाढ़ के चतुर्थ पद और श्रवण के प्रथम पद के मध्य ही अभिजीत का समावेश! चूंकि अभिजीत को पकड़ पाना कठिन है इसलिए श्रवण नक्षत्र में रावण दहन करते हैं राम के उपासक। दहन तथा स्वाहा के सिद्धान्त का आरंभ यहाँ इस अभिजीत से ही शुरू होता है।