ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं
नक्षत्र विवरण वर्तमान प्रचलित Astrology और Astronomy के निर्धारित मापदण्डों से परे है! Reader has the full right not to believe it.
रावण एक महान विद्वान था, शिव का भक्त भी लेकिन उसका अहंकार उसे ले डूबा। स्वयं को अघोर मण्डल का अध्यक्ष समझने वाले रावण के पास सब कुछ था सिवाय मर्यादा के। वह शूर्पनखा के प्रतिशोध में इतना अंधा हो गया कि ऋषि के वेश में लक्ष्मण रेखा न पार कर पाने कि स्थिति में शक्ति को ही अपनी माया से हरण कर लंका का बंदी बना लिया। रावण की शिवभक्ति, चरित्र, विद्वत्ता तथा सामर्थ्य सब कुछ उसके अहंकार के कारण महत्वहीन हो गया। ज्ञान और शक्ति प्राप्त कर लेना तथा उनका विवेकपूर्ण उपयोग करना अलग बातें हैं। शिव के प्रति भक्ति रखने वाला व्यक्ति भी अपने आचरण में मर्यादा से विचलित हो सकता है। रावण के गुण और दोष को साथ देखकर ही इस विरोधाभास को समझा जा सकता है।
ज्ञान का अभिमान जब उद्दंडता में बदल जाए और दूसरों को कष्ट पहुँचाने लगे, तब सामर्थ्य कल्याण का साधन नहीं रहती। श्रवण को सब कुछ सुन ने की शक्ति से जोड़ा गया है। यहाँ सुनने की शक्ति का अर्थ केवल कानों से सुनना नहीं है। कान बहुत सी आवाजें नहीं भी सुन पाते हैं। हनुमान के हृदय में भले ही राम बसे थे परंतु सभी के इस ब्रम्हांडीय हृदय रूपी अनाहत में तो 10 सिरों वाला रावण ही बसा है। अब इस रावण से राम राम करवाना ही प्रत्येक रावण को हनुमान बना सकता है। हृदय उस अनकहे भाव को भी सुन सकता है, जो विचारों में ही सिमट कर रह जाए और शब्दों में भी व्यक्त न हो।
यह हृदय ही है जो अंतरात्मा की आवाज सुन सकने में समर्थ। परंतु अंतरात्मा की आवाज सुन लेना मात्र पर्याप्त नहीं; उसका मर्म समझकर अपने आचरण को दिशा देना भी आवश्यक है। इस श्रवण कूट का केंद्रीय प्रश्न भी यही है—ज्ञान, भक्ति और सामर्थ्य होते हुए भी अहंकार विवेक को अपना शत्रु क्यूं मानने लगता है? रावण के विषय में विभीषण ही विवेक का कारक। और विभीषण रूपी विवेक से पृथक होने के बाद रावण का क्या होता है? श्रवण नक्षत्र में जन्मे जातकों को सदैव ही विवेकशील रहने कि जरूरत।