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NAKSHATRA 17 / 28

स्वाती — डामरी कूट

त्रूं त्रैं त्रौं ड्रं

नक्षत्र विवरण वर्तमान प्रचलित Astrology और Astronomy के निर्धारित मापदण्डों से परे है! Reader has the full right not to believe it.

स्वाती एक अनोखी व्यवस्था है, जो चंडी के समान सदैव शक्ति के साथ-साथ चलने वाली है।

यह चित्रा के समान शांत नहीं है। कभी-कभी अपने आस-पड़ोस में तूफान और बवंडर भी ला सकती है।

चित्रा के पास अकूत संपत्ति के साधन होते हुए भी वह साध्वी वेश धारण कर बड़ी सहजता और शांति से अपना सर्वस्व दान कर सकती है, किंतु स्वाती का स्वभाव इससे बिल्कुल भिन्न है।

स्वाती पहले अपने नाम का डंका बजाती है, उसके बाद सार्वजनिक रूप से मीडिया के सामने जो भी दान-दक्षिणा करनी हो, करती है।

यदि यह अपने नाम का डंका बजाने के स्थान पर शिव का डमरू बजाने का अभ्यास करे, तो शिव भी धन्य और यह स्वयं भी धन्य।

परंतु माता सीता के समान राजमहल का त्याग कर वनवास स्वीकार करना इनकी सहज प्रवृत्ति से मेल नहीं खाता। उर्मिला जी के समान यह लक्ष्मण जी से कह सकती हैं— “आप भ्रातृसेवा कीजिए, मैं इस महल में ही ठीक हूँ।”

इनकी संगति और इनके संग का प्रभाव स्वाती नक्षत्र की उन तीन बूँदों के समान समझा जा सकता है, जिनका वर्णन भारतीय काव्य परंपरा में मिलता है।

एक ही स्वाती की बूँद नाग के मुख में गिरकर विष, सीप में गिरकर मोती और केले के गर्भ में गिरकर कपूर बनती है।

बूँद एक ही है, किंतु संगति बदलते ही उसका स्वरूप और परिणाम दोनों बदल जाते हैं।

स्वाती की प्रकृति को समझने के लिए यह उदाहरण पर्याप्त है। इसकी संगति किसके साथ है और किस परिस्थिति में है, यह विशेष महत्त्व रखता है।

इनकी श्रद्धा और भक्ति में कोई कमी नहीं होती, किंतु इनके व्यवहार में स्वार्थ को प्राथमिकता प्राप्त होती है। परमार्थ भी इनके लिए महत्त्वपूर्ण है, लेकिन उसकी बारी स्वार्थ की पूर्ति के बाद ही आती है।

पहले स्वार्थ, बाद में परमार्थ—यही स्वाती नक्षत्र के डामरी कूट का मूल सिद्धांत है।

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