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NAKSHATRA 22 / 28

पूर्वाषाढ़ — ब्रम्हषष्टा कूट

ब्रुं ढं णं ठं

नक्षत्र विवरण वर्तमान प्रचलित Astrology और Astronomy के निर्धारित मापदण्डों से परे है! Reader has the full right not to believe it.

ब्रुं ढं णं ठं

बड़ादेव — बूढ़ादेव — ठाकुरदेव।

इन्हें जंगल का भगवान कहना गलत होगा, क्योंकि ये स्वयं जंगल स्वरूप हैं।

स्वयं को अजेय समझने वाला यह कलियुग का स्वामी, शिव का सबसे बड़ा विद्रोही है। इस दार्शनिक चित्रण में इसकी विद्रोही शक्ति को धरती पर भय और उथल-पुथल के चरम प्रतीक के रूप में देखा गया है।

आषाढ़ पूर्णिमा की गुरुपूर्णिमा भी इसी शनीचर की मनती है। इसका कारण केवल एक है—सारे मण्डल, अखाड़े एवं धार्मिक संस्थाएँ यही ब्रम्हषष्टा चला रहे हैं। लेखक की दृष्टि में ढोंग और मिथ्या पर आधारित यह आडंबर पूरी धरती पर फैला हुआ है।

ये महोदय पुरुष होते हुए भी महिलाओं की तरह साड़ी पहनने के शौकीन हो सकते हैं। निर्ऋति के पति भी यही महोदय हैं। ये पुरुषप्रेमी तथा स्त्रियों से द्वेष करने वाले भी पाए जा सकते हैं।

दुनिया इस अभावग्रस्त स्वरूप को कुबेर के नाम से जानती है, जबकि इनका वास्तविक स्वरूप वैसा बिल्कुल भी नहीं, जैसा दिखाया जाता है।

धनु में धन नहीं है प्यारे, शिव की भभूति से ही धन!

किंपुरुष खंड का यह इलाका इसी धरती के अधिकार क्षेत्र में आता है। लेकिन रुष्ट होने पर किन्नर भी संहारकाल के समान आँखें लाल कर सकता है।

अपवाद केवल इतना कि इस क्रोध कूट की आँखें केवल स्त्रियों के सामने लाल होती हैं, पुरुषों के सामने नहीं!

विकृत परिस्थितियों में यह कुबेर स्त्री-बलि भी ले सकता है।

इसके हजारों नाम हैं। यह हर धर्म में समाया हुआ है और इस धरती पर दिखाई देने वाला सारा नरक, सब इसी की माया है।

ब्रम्हबटुक भी इसी का नाम है। इसके उद्धार में ही समस्त आपदाओं का उद्धार है।

इसकी भक्ति करने वाले को सदा-सदा के लिए नरक का बंदी होकर ही रहना है।

समाज में यह मनुष्य के शरीर में एक प्रकांड ब्राम्हण के रूप में भी उपस्थित हो सकता है। संभव है कि खड़ाऊँ पहनता हो, लहसुन-प्याज से परहेज करता हो और किसी भी स्त्री की ओर कामुक दृष्टि से न देखने वाला बाल ब्रम्हचारी, लंगोटधारी भी हो।

वह स्त्रियों की ओर नहीं देखता, इसका अर्थ यह नहीं कि पुरुषों की ओर भी नहीं देखता!

गुदा मैथुन को इस पूर्वाषाढ़ का अपरिवर्तनीय तत्व बताया गया है। किसी को बुरा न लगे, क्योंकि सहमति से वयस्क पुरुषों के समलैंगिक संबंधों को भी कानूनी संरक्षण प्राप्त है। धारा 377 का पुराना प्रतिबंध अब उन संबंधों पर लागू नहीं होता।

विशाखा का “बॉस” यहीं पूर्वाषाढ़ में बैठता है।

इस रूपक में विशाखा अपने अधिपति के सामने विवश दिखाई देता है।

इनकी योजनाएँ प्रायः भूमिगत रहती हैं। विकृत स्वरूप में ये कुख्यात सरगनाओं के भी अधिपति बन सकते हैं।

सामान्य घरों अथवा खुले महलों में रहना इन्हें पसंद नहीं। भूमिगत शेल्टर अथवा किले जैसी सुरक्षित व्यवस्था में रहना अधिक पसंद करते हैं।

लगभग सभी विद्याओं का विद्याधर होना इनके लिए संभव है। ये गूढ़वादी तथा अवसरवादी भी हो सकते हैं।

भगवान-भगवान बोलकर स्वयं भगवान को भी बंदी बनाने वाले महातान्त्रिक पूर्वाषाढ़ में ही जन्म लेते हैं।

इनका शुद्धिकरण, रक्षण तथा व्यवस्थापन—तीनों ही “भैरव दंड” के अधीन हैं।

यदि आप पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में जन्म ले ही चुके हैं, तो कृपया भैरव बाबा की शरण में जाएँ और जो सूत्र वे बताएँ, उनका पालन करें।

वे आपके बड़े भाई के समान आपका मार्गदर्शन करेंगे।

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