Skip to content
RB
RIGHT BRAIN CONSULTANCYBE WISE & BE BETTER.
Client Login

NAKSHATRA 13 / 28

पूर्वाफाल्गुनी — वैतरणी कूट

म्रौं रां रीं रूं

नक्षत्र विवरण वर्तमान प्रचलित Astrology और Astronomy के निर्धारित मापदण्डों से परे है! Reader has the full right not to believe it.

कूट: वैतरणी कूट

मूल तत्व: मातृशक्ति, सर्वसंकट निवारण, संहार एवं तारण

गूढ़ स्वरूप: रुद्ररूपिणी वैतरणी, लोकमाता, परमेश्वरी की सेविका एवं उत्कीलित पराशक्ति

वैतरणी कूट — मातृशक्ति, संहार और भविष्य का परिवर्तन

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै वैतरणी, मधु-कैटभ-हन्त्री पूर्वाफाल्गुनी!

सर्वसंकटवारिणी शिव-शिवा, मातृशक्तिस्वरूपिणी तारिणी!

संकटा और निर्ऋति भी इनके यहाँ सेवा में उपस्थित रहती हैं।

यद्यपि इस गूढ़ शक्ति का अपना कोई पृथक, स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, तथापि यह सदैव परमेश्वरी की सेवा में उपस्थित रहती है। इसकी अधीनता दुर्बलता नहीं, बल्कि उस सर्वोच्च सत्ता के प्रति समर्पण है जिससे इसकी समस्त सामर्थ्य प्रवाहित होती है।

षोडश मातृकाओं के रहस्य में माता और लोकमाता का भेद यहीं से प्रारंभ होता है।

माता किसी एक संतान की जननी अथवा संरक्षिका हो सकती है, किंतु लोकमाता की भूमिका व्यक्तिगत संबंधों से कहीं आगे जाती है। वह केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि वंश, अस्तित्व, संरक्षण और विनाश की संभावनाओं को भी प्रभावित करने वाली शक्ति है।

इनकी इच्छा के बिना संकटा और निर्ऋति का वंश आगे नहीं बढ़ता।

यही कारण है कि कभी-कभी 'न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी' का सिद्धांत इनके भीतर ऐसी उग्रता उत्पन्न कर सकता है, जिसके सामने सामान्य उपाय अपर्याप्त प्रतीत होते हैं।

शिव का रुद्राभिषेक किया जाए अथवा नहीं, किंतु इस देवी के रौद्र स्वरूप का रुद्राभिषेक नितांत आवश्यक हो उठता है!

इनकी सर्वभेदक सामर्थ्य इन्हें ग्रीक परंपरा की रिया (Rhea), क्रोनस की पत्नी, के तुल्य प्रस्तुत करती है। पुत्रमोह अथवा मातृत्व की रक्षा के लिए वह अपने पति के विरुद्ध भी खड़ी हो सकती है।

परंतु यहाँ एक विचित्र विरोधाभास उपस्थित है।

भविष्य को परिवर्तित कर सकने का सामर्थ्य होना और भविष्य के अंतिम परिणाम को जानना—दो अलग बातें हैं।

यदि इन्हें प्रत्येक परिणाम का पूर्वज्ञान होता, तो समस्त घटनाएँ इनके नियंत्रण में होतीं।

तब इनके पति भूतनाथ शिव संकटा के कैदी क्यों होते? पुत्र-पुत्रियों का पतन कैसे संभव होता?

यह कैसी व्यवस्था है जिसमें रानी नौकरानी बन जाए, राजा गुलाम हो जाए और पुत्र-पुत्रियाँ भिखारी बन जाएँ!

यही वैतरणी कूट की सबसे विचित्र विडंबना है।

एक ऐसी शक्ति जो दूसरों के भाग्य को परिवर्तित कर सकती है, किंतु स्वयं अपने निर्णयों के समस्त परिणामों से अनिवार्यतः परिचित नहीं होती।

इनके निर्णय भविष्य की दिशा बदल सकते हैं। इसके लिए भविष्य को जानना आवश्यक नहीं।

कभी एक निर्णय संपूर्ण वंश का संरक्षण कर सकता है, तो कभी वही निर्णय उसके विनाश का प्रारंभ बन सकता है।

मृत्यु के पश्चात प्रकट होने वाली विद्या

यह वह विद्या है जिसका वास्तविक रहस्य कभी-कभी मृत्यु के पश्चात, अंतिम संस्कार के समय ही उद्घाटित होता है।

'राम नाम सत्य है' का 'राम' आवश्यक नहीं कि केवल श्रीराम का ही संकेत हो।

इस गूढ़ व्याख्या में 'र' को रसिका अथवा रसिका-धातु के प्रतीकात्मक अर्थ से भी देखा जा सकता है। यहाँ शब्द केवल किसी एक देवता का नाम नहीं, बल्कि चेतना, शक्ति और अंतिम सत्य के अनेक स्तरों की ओर संकेत करता है।

श्रीराम को खोजने निकलो, तो संभव है कि उस प्रतीकात्मक यात्रा के अंत में श्रीराम के स्थान पर शिव और उनकी श्रीमती जी ही उपस्थित मिलें!

यही वैतरणी की रहस्यमयी प्रकृति है—जिसे एक नाम में बाँधना संभव नहीं।

उत्कीलित शक्ति — बंधन से परे

पापपुरुष की अम्मा हो अथवा शैतान की पत्नी—दोनों ही प्रतीकात्मक स्वरूपों में यह शक्ति सदैव उत्कीलित है।

इसे कोई बाँध नहीं सकता।

न संकटा, न निर्ऋति, न कोई अन्य बंधन इसकी सहज गति को पूर्णतः नियंत्रित कर सकता है।

'श्रीं' बीजमंत्र इसकी सहज गति का प्रतीक है।

यह शक्ति केवल संहार नहीं करती, केवल संरक्षण नहीं करती, केवल मातृत्व का निर्वाह नहीं करती—बल्कि आवश्यकता पड़ने पर स्थापित व्यवस्थाओं को भी परिवर्तित कर सकती है।

इसके लिए किसी निर्णय का अंतिम परिणाम जानना आवश्यक नहीं।

फल्गु, पितृतर्पण और पराशक्ति

पितृतर्पण से संबद्ध फल्गु नदी इस गूढ़ व्याख्या में पराशक्ति की ही एक अपर शक्ति का प्रतीक बनकर उपस्थित होती है।

यहाँ जल केवल जल नहीं, बल्कि वंश, स्मृति, ऋण, मृत्यु और मुक्ति के बीच प्रवाहित होने वाला माध्यम है।

वैतरणी और फल्गु—दोनों के संकेत मृत्यु के पार स्थित उस संबंध की ओर जाते हैं जहाँ जीवित और दिवंगत, माता और संतान, तथा अस्तित्व और विसर्जन के बीच का भेद नया अर्थ ग्रहण करता है।

इस प्रकार पूर्वाफाल्गुनी का वैतरणी कूट केवल मृत्यु से पार उतारने वाली शक्ति नहीं, बल्कि जन्म, वंश, मातृत्व, संहार और भविष्य के परिवर्तन की संभावनाओं को धारण करने वाली विद्या है।

वैतरणी कूट — शांति, व्यवधान और संहार

वैतरणी में पीब और मवाद बहते हैं अथवा नहीं, यह तो अज्ञात है; किंतु इनकी शांत अवस्था में असहनीय खलल उत्पन्न करने वाला स्वयं इनके रौद्र स्वरूप को आमंत्रित करता है।

ये अनावश्यक रूप से किसी का संहार करने नहीं निकलतीं। किंतु जब कोई इनकी शांति को बार-बार भंग करता है और व्यवधान असहनीय हो जाता है, तब इनकी सहिष्णुता रौद्रता में परिवर्तित हो सकती है।

इनकी शांति को दुर्बलता समझना ही सबसे बड़ी भूल है। जो शक्ति संसार को संकट से पार उतार सकती है, वही अपनी शांति भंग होने पर संहारिणी का प्रतीकात्मक स्वरूप भी धारण कर सकती है।

इनका रौद्र स्वरूप कारण नहीं, परिणाम है।

COOKIE CONSENT

Essential cookies support this website. Optional analytics and marketing are used only with your permission.