ॐ ज्रां ज्रीं ज्रुं
नक्षत्र विवरण वर्तमान प्रचलित Astrology और Astronomy के निर्धारित मापदण्डों से परे है! Reader has the full right not to believe it.
सदैव शिव के संग रही संजीवनी, सदा ही विपरीत रोहिणी।
तृतीय नेत्र ज्वाला, जं जं ज्येष्ठा जातवेदो मआवह।
जामिशंसाद जिष्णुः ब्रम्हराक्षस, काम-कालांतकाय अंबुजाक्ष, अट्टहास विध्वंसी काकभक्षी, वास्तविक वीरभद्र जटाधारी—ॐ नमो नमः ज्येष्ठा।
यज तथा यजामहेश्वर का अंतर जाने बिना शिव को समझ पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।
ज्येष्ठा का जहर भी शिव के सान्निध्य में संजीवनी बन जाता है। ज्येष्ठा को शिव के तृतीय नेत्र के साथ-साथ स्वयं का भी तृतीय नेत्र ही समझिए।
जिसका तृतीय नेत्र जाग्रत, वह शिव। जिसका बंद, वह जीव।
जीव जब तक स्वयं को शिव से पृथक समझता रहेगा, तब तक निर्जीव ही रहेगा। वैसे भी सबका तृतीय नेत्र मानो मृत और निष्क्रिय पड़ा है।
कामदेव-दहन में जो ज्वाला धधकी थी, उसमें केवल काम ही भस्म नहीं होता, बल्कि समस्त कामनाएँ और बंधन भी ध्वस्त हो जाते हैं।
यह संसार मिथ्या प्रतीत होने लगता है। किसी भी वस्तु के प्रति मोह अथवा लालसा शेष नहीं रहती। उसके बाद संसार का समस्त वैभव और आकर्षण महत्वहीन लगने लगता है।
जल्लाद भी संन्यासी अथवा वैरागी बन जाता है।
भूत, वर्तमान और भविष्य जैसा कुछ भी शेष नहीं रहता, जिसे जानना आवश्यक प्रतीत हो।
अंतरे के केंद्रीय मंच पर स्थित यह शक्ति, जाग्रत होने पर किसी की विरोधी नहीं रहती।
समस्त योगी तृतीय नेत्र की धधकती हुई अग्नि को स्वर्णिम प्रकाश में रूपांतरित करने का प्रयास करते हैं।
अंतरे के संघर्ष और चुनौतियाँ ही इन्हें अपने स्वर्णिम गंतव्य की ओर ले जाती हैं।
ये किसी भी दृष्टिकोण से निर्धन नहीं होते, किंतु धन, भौतिक सुविधाओं और सहज जीवन के साधनों के प्रति इनका कोई विशेष आकर्षण नहीं होता।
इनका वास्तविक वैभव बाहरी संपत्ति में नहीं, बल्कि उस आंतरिक स्वर्णिम प्रकाश में निहित है, जो तृतीय नेत्र की अग्नि के रूपांतरण से प्रकट होता है।