ब्रैं ब्रौं व्रां व्रीं
नक्षत्र विवरण वर्तमान प्रचलित Astrology और Astronomy के निर्धारित मापदण्डों से परे है! Reader has the full right not to believe it.
आज तक कोई समझ नहीं पाया कि ब्रम्हा विश्वकर्मा के साथ रहते हैं या विश्वकर्मा ब्रम्हा के साथ!
तो उत्तर सुनिए—विश्वकर्मा जी मकर राशि के उत्तराषाढ़ नक्षत्र में ब्रम्हा जी के दूत अथवा मंत्री के रूप में सदैव ब्रम्हा के दाहिने रहते हैं।
ये दूसरे अजेय हैं, जिनसे कोई जीत नहीं सकता। कर्म और प्रारब्ध सभी को भोगना है—यही है कर्म का नियम!
अब मैं केवल एक ही बात कहना चाहूँगा कि यम किपोर नामक यहूदी महोत्सव में लॉर्ड और अजाजील के लिए जो दो बकरे चढ़ाए जाते हैं, वर्ष भर किए गए पापों से मुक्ति के लिए, उनमें से पहले बकरे का नाम है ब्रम्हा और दूसरे का नाम विश्वकर्मा।
यम के ये दोनों नियामक स्वयं कितने गलत हैं, यह इन्हें स्वयं नहीं पता!
अब नहीं पता तो नहीं पता! मकरध्वज के समान महिरावण के द्वारपाल बने रहो। इंतजार करो कर्म के विध्वंसियों का। वे अब ज्यादा दूर नहीं, आपके बहुत नजदीक आ चुके हैं!
न तो बगीचा स्वयं का स्वामी है और न ही इस बगीचे के पिताजी!
यह ब्रम्हांड रूपी बगीचा परमात्मा शिव का है और उनके संविधान की पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि चित्रगुप्त को मार्कण्डेय के लिए फाँसी लिखने का अधिकार नहीं!
कर्म कभी भी सुकर्म को चुनौती नहीं दे सकता। न ही किसी तपस्यारत के मार्ग में खलल डालने का उसे अधिकार है।
जिसके माथे पर शिव के नाम का ठप्पा लग चुका, वह यम के नियमों से परे है!
कर्म किसी से जबरदस्ती गुलामी नहीं करवा सकता। न ही आजीविका के लिए किसी को तिल-तिल घुटने और संसार का सेवक बनने के लिए बाध्य कर सकता है।
यदि कर्म किए बिना आपको संतोष नहीं मिलता, तो अपनी इच्छा के अनुसार कर्म कीजिए; दूसरों को इसके लिए विवश करना उचित कैसे है?
आपकी यह वैश्विक व्यवस्था विषरहित रहे, इसकी थोड़ी चिंता तो उत्तराषाढ़ के जातकों को भी होनी चाहिए।
थोड़ा-सा लोगों को जी भी लेने दो, अधिकतम कर्म के बदले न्यूनतम वेतन देने वाले मेजबानों!
घड़ियाली आँसू बहाना इस नक्षत्र की पहचान है।
आधी बुराई और आधी अच्छाई लिए यह “मकरध्वज” कभी-कभी अपने ही लोगों को खाकर बाद में शोकसभा में भी उपस्थित होगा। और रोएगा ऐसे, जैसे इसने कुछ किया ही नहीं!
मकर की खासियत है कि वह अपने शिकार को गहरे पानी में खींचकर ले जाता है। फिर पेट-पूजन के पश्चात किसको क्या पता? किसने देखा?
“मैंने नहीं खाया!”
यदि कोई प्रत्यक्षदर्शी मौजूद हो, तो फिर—
“अरे, वह तो गलती से पकड़ लिया था! किनारे ही तो छोड़ दिया था। अब उसके बाद क्या हुआ, मुझे क्या मालूम? जल में और भी तो जीव हैं! किसी दूसरे ने खा लिया होगा। वे तो मेरे मित्र समान थे। उनकी मृत्यु का मुझे भी अफसोस है!”
वाणी की चतुराई और विवेक इस नक्षत्र के पास बहुत है। कभी-कभी आंतरिक रिश्तों में भी मृत्यु जैसे षड्यन्त्र अथवा विश्वासघात इस नक्षत्र का जातक कर सकता है।
वरुण! वरुण! सभी कहते हैं कि वह घड़ियाल की सवारी करता है।
जबकि लोगों को यह भी नहीं पता कि घड़ियाल का नाम ही वरुण है, जिसकी सवारी काल करता है!
चूँकि काल को ब्राम्हणों द्वारा छिपाया गया है, इसलिए विश्वदेव नामक घड़ियाल ही Officiating Kaal है।