भ्रूं धं नं थं
नक्षत्र विवरण वर्तमान प्रचलित Astrology और Astronomy के निर्धारित मापदण्डों से परे है! Reader has the full right not to believe it.
मंत्र: ॐ भ्रुं भूधरायै नमः
धर्मरात्रि धूमावती के नाम से जानी जाने वाली इन महाविद्या को साक्षात भूदेवी ही समझिये तथा नर्मदा मइया का ध्यान करते हुए इन्हें राधे राधे कहना ही सर्वोचित। True North के इस स्वरूप में नर्मदा मैया को नमन कीजिए। इस धरती को धारण करने वाले महाशिव महादेव हैं। उत्तराभाद्रपद की भूधर नागेश्वरी ही कैसीओपिया नामक धन की देवी हैं। यही प्रथमा हैं, अंतिमा इनके बाद में आईं। ये अत्यंत ही गूढ़ तथा रहस्यमयी शक्ति हैं जो परमात्मा का ही अंश हैं। “धनदा तथा धीषणा” देवी के नाम से प्रसिद्ध इन देवी के अलावा किसी के पास धन नहीं। लक्ष्मी इनकी पुत्री के समान हैं। यह शक्ति अपार संपदा की अधिष्ठात्री होने के साथ-साथ कठोर परीक्षाएँ भी लेती हैं। एक आदेश पर सब कुछ प्रदान करने का सामर्थ्य रखते हुए भी ये साधक को अघोर दरिद्रता का अनुभव करा सकती हैं। ये दंड तथा आनंद दोनों ही देने में पूर्णतया सक्षम हैं। गोंडवाना में इन्हें बूढ़ी खेर माई के नाम से जाना जाता है।
गधे और बंदर इनके वाहन-संबंधी प्रतीकों में आते हैं। उत्तर ध्रुव के इर्दगिर्द कभी भी अपनी धुरी को न छोड़ने वाली यह देवी शैव धर्म को धारण करने वाली शक्ति हैं।
लेकिन शैव विरोधी पंथ इन्हें अधर्म का प्रतिनिधि समझते हैं। ये स्वयं नियति हैं तथा यम के नियमों से परे हैं। ब्रम्हा तथा विश्वकर्मा सदैव ही इनसे भयग्रस्त रहते हैं।
नामा-नामशक्ति के रूप में ये नागों की अधिष्ठात्री हैं तथा इनका दिन शनिवार है। शनिवार के दिन यदि उत्तराभाद्रपद नक्षत्र पड़े तो सूर्यास्त के बाद उत्तरी ध्रुव की तरफ मुख करके इनकी साधना की जा सकती है। वैसे तो ये नित्य ही स्थिर रहने वाली महादेवी हैं और ये ऋतु, मास, वार, घटी से परे हैं परंतु फिर भी दरिद्रजन शनिवार और उत्तराभाद्रपद को ही रानी का महल जानें। ये अटल हैं; इस अटलता को उनका हठ न समझें। इनसे निश्छल शायद ही कोई हो। इस नक्षत्र में जन्मे लोग गुप्त क्रियाओं में पारंगत हो सकते हैं। इनके गुणधर्म जन्मजात होते हैं भले ही उन्होंने इसका अभ्यास न किया हो। ये अक्सर लोगों का भला नहीं तो बुरा भी नहीं करते। ये समय और मौसम के हिसाब से नहीं बदलते। इनके लिए पुरानी चीजें, पुराने मित्र और पुराने खयाल मायने रखते हैं। जिस तरह से यह धरती उत्तरी ध्रुव की ओर झुककर नमन कर रही है, वैसे ही समस्त मनुष्यों को नक्त अर्थात् सूर्यास्त के पश्चात उत्तरी ध्रुव की ओर श्रद्धापूर्वक नमन करना चाहिए। इनके बारे में सोचना भी पर्याप्त है। राधा जो भी हैं, कृष्ण का पीछा करने द्वारका नहीं जाएँगी। ये कृष्ण से बड़ी हैं और उनकी मालिक भी हैं, और इनके लिए केवल प्रेम मायने रखता है। ये प्रेम को पाप या रोग नहीं समझतीं। और प्रेम किसी को भी किसी से भी हो सकता है, चाहे वह इस दुनियावी भाषा में जायज हो या नाजायज। अंततः ये स्वयं हठी नहीं, बल्कि हठी व्यक्तियों के हठ का समाधान करने वाली देवी हैं।