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NAKSHATRA 11 / 28

आश्लेषा — महादुष्ट कूट

द्रीं द्रुं द्रै द्रौं

नक्षत्र विवरण वर्तमान प्रचलित Astrology और Astronomy के निर्धारित मापदण्डों से परे है! Reader has the full right not to believe it.

कूट: महादुष्ट कूट

मूल तत्व: उदरशूल

प्रतीकात्मक स्वरूप: मृत्यु का अधिष्ठाता, नागशक्ति, वर्चस्व एवं दम्भ

वर्चस्व, शिकंजा और महामृत्यु

प्रजापति दक्ष!

आश्लेषा नक्षत्र की इस गूढ़ व्याख्या में जन्मजात वर्चस्व की भावना एक प्रमुख प्रवृत्ति है। दया इनके स्वभाव का स्थायी प्रदर्शन नहीं, बल्कि कभी-कभी दिखाई देने वाला एक दुर्लभ पक्ष प्रतीत होती है।

यदि मृगशिरा की कठोर प्रवृत्ति को दुष्टता कहा जाए, तो आश्लेषा के चरम विकृत स्वरूप को महादुष्ट कहना अनुचित नहीं होगा।

अभिमान जब इनके विवेक पर अधिकार कर लेता है, तब संबंधों की मर्यादा भी गौण हो सकती है। माता-पिता, गुरु, भाई अथवा पत्नी—कोई भी इनके आहत अहंकार से उत्पन्न कठोरता का सामना कर सकता है। प्रतीकात्मक अर्थ में, ये अपने वर्चस्व की रक्षा के लिए निकटतम संबंधों को भी सूली पर चढ़ाने की सीमा तक पहुँच सकते हैं।

इनका शिकंजा साधारण नहीं होता। जिस पर इनकी पकड़ स्थापित हो जाए, उसके लिए उससे मुक्त होना अत्यंत कठिन हो सकता है। नाग की भाँति कुंडली मारकर बैठे रहना इनकी निष्क्रियता नहीं, बल्कि अवसर की प्रतीक्षा का प्रतीक है। समय आने पर यही नाग अपना संपूर्ण फन प्रदर्शित कर सकता है।

इनकी हठधर्मिता और अत्यधिक कठोरता के विपरीत, इनकी पत्नी के सहज एवं सहिष्णु होने का एक विशिष्ट विरोधाभास इस व्याख्या में दिखाई देता है।

कर्क राशि से संबद्ध आश्लेषा यहाँ आध्यात्मिक अर्थ में एक ऐसे कैंसर का प्रतीक बनती है, जो भीतर ही भीतर चेतना को ग्रस सकता है। यह चिकित्सकीय रोग का संकेत नहीं, बल्कि अहंकार की उस विकराल अवस्था का रूपक है जिसका साधारण उपाय संभव नहीं दिखाई देता।

इनका सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि स्वयं को छोड़कर शेष संसार इन्हें दोषपूर्ण दिखाई दे सकता है।

दुर्गमासुर की भाँति दुर्गम्य, मिथ्या हयग्रीव की पौराणिक छवि से संबद्ध और तारा महाविद्या के संहारात्मक स्वरूप के सामने उपस्थित—ये सभी संकेत इस कूट की गूढ़ प्रतीक-व्यवस्था का हिस्सा हैं। गोंड परंपराओं के दूल्हादेव का संदर्भ भी इस व्याख्या में एक सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में आता है।

इनका दम्भ इतना प्रबल हो सकता है कि जब तक महामृत्यु स्वयं इनके सामने उपस्थित न हो, मृत्यु का अधिष्ठाता स्वयं को ही ब्रम्हांड का स्वामी समझने लगता है।

वह जो लोहा भी चबा जाए, पचा जाए; जिसकी सहनशक्ति असाधारण प्रतीत हो, किंतु जिसका अहंकार इतना फूल चुका हो कि किसी भी क्षण फट पड़ने की स्थिति में पहुँच जाए!

अस्तित्व भले ही दयनीय हो जाए, परिस्थितियाँ प्रतिकूल हो जाएँ, संबंध टूट जाएँ, किंतु दम्भ इनका साथ छोड़ने को तैयार नहीं होता।

'कत्ल' इनके लिए दोधारी तलवार है। एक ओर इस शब्द में छिपी मृत्यु की संभावना इन्हें भयभीत कर सकती है, तो दूसरी ओर इनके अंधकारमय स्वरूप में इतनी निर्ममता की कल्पना की गई है कि हिंसा भी सामान्य आचरण का रूप धारण कर सकती है।

यहाँ हिंसा का संकेत किसी जन्मजात व्यक्ति के निश्चित व्यवहार का निर्णय नहीं, बल्कि अनियंत्रित अहंकार और संवेदनहीनता की चरम प्रतीकात्मक अवस्था है।

अंतिम रहस्य

संवेदनाएँ यदि शून्य हों, तो संवेदना भी 'शूल' बन जाती है।

यही आश्लेषा का उदरशूल है—वह शूल जो केवल उदर में नहीं, बल्कि अहंकार से जकड़ी चेतना में भी उपस्थित हो सकता है।

और जब तक वह शिकंजा स्वयं के भीतर नहीं टूटता, तब तक संसार को जकड़ने वाला नाग अपनी ही कुंडली का बंदी बना रहता है।

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