आं ईं ऊं ऐं
नक्षत्र विवरण वर्तमान प्रचलित Astrology और Astronomy के निर्धारित मापदण्डों से परे है! Reader has the full right not to believe it.
अकेला, निर्विकल्प, शिव का शिष्य और काम का द्रोही—अजीब है अनुराधा का ब्रम्हसूत्र!
मोक्ष के मुहाने पर अधर में युद्धरत इस असुर कूट को शिव का त्रिशूल ही समझिए, जो वृश्चिक की पहचान है।
इन्हें सदैव सीधा रहने की आवश्यकता है। सामान्य परिस्थितियों में भी ये अत्यंत क्रूर प्रतीत हो सकते हैं।
यह एक ऐसा भक्त है, जो इब्राहीम के समान अपने पुत्र को भी अल्लाह के नाम पर चढ़ाने के लिए तैयार हो जाए।
ये क्या-क्या कर सकते हैं, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। इनकी क्षमताओं की सीमाएँ निर्धारित करना सहज नहीं; यह कहना कठिन है कि ये क्या कर सकते हैं और क्या नहीं।
असंभव को भी संभव कर सकता है अनुराधा का जातक!
लेकिन यहाँ भी शर्त वही है—कहीं यह स्वयं जमीन में तो नहीं जमींदोज हो गया?
असाधारण क्षमताओं के बावजूद कोई कंकड़-पत्थर भी इन्हें विवश कर सकता है।
यदि शिव समाधि में हों और भैरव निद्रा में, तो इस त्रिशूल को विश्वकर्मा जी धारण करते हैं, जो सत्य की सेहत के लिए बिल्कुल भी हितकारी नहीं।
धर्म वही है जो आश्रय दे, विवशता नहीं।
यदि ब्रम्हदेव विकृत हो सकते हैं, तो फिर विश्वकर्मा जी तो मात्र विश्वदेव विप्रकर्ण हैं, जिनका ध्यान कर बकरे हलाल किए जाते हैं।
देव-असुर संग्राम का आरंभ इसी अनुराधा नक्षत्र से होता है और शतभिषा तक पहुँचते-पहुँचते आपको पता चल जाना चाहिए कि वास्तव में देव कौन हैं और असुर कौन!
The serious business begins here—where the actual regulators of the Cosmos come into play.